Wednesday, 5 June 2013
shaneshwar maharaj कल् कल् मिनाद् करती हुयी पतित पावनी पूर्ण शलिला मन्दाकिनी के पावन तट पर पर्वतराज हिमालय की गोद मे सिल्ला नामक स्थान पर शाणेश्वर का भव्य मन्दिर है. जन श्रुतियो एवम् लोक कथाओ के आधार पर कहा जाय तो इस पुरातन स्थान पर शाणेश्वर महाराज की पूजा हुआ करती थी, लेकिन कालान्तर में इस स्थान पर दैत्यों का बोलबाला हो गया ये दैत्य नरभछी हुआ करते थे, जो भी पुजारी मन्दिर में पूजा करने जाता ये दैत्य उसका भक्षण किया करते थे। कहा जाता है कि जब देवता का मात्र एक पुजारी रह गया तो शक्ति के उपासक महात्मा अगस्त्य उस पर दया भाव दिखाने के लिए इस स्थान् पर चले आये और उस दिन की पूजा का दायित्व स्वयं ले लिया, जब महिर्षि अगस्त्य पूजा करने के बाद उपचा ही रहे थे तभी ये मायावी दैत्य प्रकट हो गये, इन्हे देखकर महिर्षि कुम्भज संकट में पड गये, एकाएक वे अपनी कोख को मलने लगे और उस पराशक्ति का ध्यान् करने लगे जिसने ब्रह्मा विश्नु देवताओ को मधु और कैटव जैसे दैत्यों से अभय दान दिया था, महिर्षि अगस्त्य ने जैसे ही पराशक्ति का ध्यान किया तभी मां भगवती, कुशमान्डा के दिव्य रूप में प्रकट् हो गयी, विविध आयतों से युक्त उस सिंह वाहिनी ने समस्त् दैत्यों का संहार किया, लेकिन इनमें से आतापी और वातापी दो दैत्य भाग गये, इनमें से एक दैत्य बद्रीनाथ में छिप गया तब से लेकर अज तक बद्रीनाथ में शंक नहीं बजता और दुसरा दैत्य सिल्ली की नदी में छिप गया. ऒर अधिक जानकारी के लिए कृपया शाण जग्गी की सी.डी. कैसेट् देखैं. दीपक पुरोहित.
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